गर तेरे आने का जरा भी आसार होता।
आलमे तस्वीर में कुछ तो करार होता।
ना तो मीआद ही आई और ना तकाज़ा ही आया,
काश कोई वादा मेरे सर पर उधार होता।
निगाहे हसरत को लेकर मैं कभी घर से नही निकला,
गर निगाहे रहम मिलती तो रुस्वा हज़ार होता।
अछ्छा हुआ जो आज मैं वादिये नाला से दूर हूँ,
सुना है आज भी फ़िर किसी बिस्मिल पे वार होता।
माँ के सब्र का आलम है गला आज भी तर है,
वरना मैं भी कई रोज से नाहार होता।
मुफलिसी क्या है ' लिहाज़ ' मेरे उसूलों की बात है,
ज़मीर बेच देता तो मैं भी ज़मींदार होता।
आलम तस्वीर - निश्त्ब्ता का आलम
निगाहे हसरत - उम्मीद भरी निगाहें
वादिये नाला - फरियाद की घाटी
बिस्मिल - घायल
नाहार - भूखा प्यासा
1 comment:
HI ! Lihaz I have read your poetry and like the way you used URDHU words very decently in your poetries . I like the way you puts your name in each of your poety .
Good Going Lihaz
Best of Luck for your Sayary Future.
Nitin Kumar (Noida, Bhojipura)
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