दिल तो बहुत करता है, मगर कहाँ से लाऊं।
शोल- ए - दीदार को, एक नज़र कहाँ से लाऊं।
ख्यालों में अब तेरी तस्वीर कि रानाई,
रूबरू आंखों के तेरा मंज़र कहाँ से लाऊं।
बागों-बाहर मिले, ना सावन कि फुहार में मिले,
खुश्नुमायी तेरी जुल्फ से बेहतर कहाँ से लाऊं।
तसब्बुर कि बात है, सब ख्यालों का जहान है,
तेरे प्यार कि दुनिया ज़मीं पर कहाँ से लाऊं।
कितने अंधेरे में आज भी रौशनी का आलम,
तुझको ए दिले नाशाद, नूरे - सहर कहाँ से लाऊं।
बहुत महंगी है ' लिहाज़ ' इस दौर में रोटियां,
अब दिल कि हसरतों का घर कहाँ से लाऊं।
शोले दीदार - देखने कि आग
नूरे- सहर - सुबह के उजाले
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