Monday, April 14, 2008

क्यों कर जिया जाए

हँसकर जिया जाए कि रोकर जिया जाए
ज़िंदगी तू ही बता तुझे क्योंकर जिया जाए।
हर साँस दिए जाती है एक दर्द का आलम,
किस तरह तेरे पहलु में दीद ए तर जिया जाए।
जिनके महफूज़ दिल हैं उनपे लानत है ज़िंदगी,
जीना तो वही है जीना किसी का होकर जिया जाए।
बेखुदी ज़ुनुने इश्क में पहुँची है इस मुकाम पर,
तुझे पाकर जिया जाए ना तुझे खोकर जिया जाए।
तू जब भी मिला है आंखें चुराकर मिला है,
अब किस बिना पर तेरा होकर जिया जाए।
जबकि मुर्दे भी कायल हैं तेरी बेज़ुबानी ते ' लिहाज़ ',
इससे कहीं बेहतर है की सीकर जिया जाए।



दीद ए तर - नम आंखें

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