Monday, April 28, 2008

अंजुमन में ...

गुल यूं ही न शिगुफ्ता है, खारों की अंजुमन में।
कोई लुत्फ़ तो रहा है शरारों की अंजुमन में।
लोग तूफां को जीत आए हैं, मौजों से खेल आए हैं,
मैं कबसे जी रहा हूँ, किनारों की अंजुमन में।
इरादों सामाने सफर कर लो बहुत दूर जाना है,
तख्त इन्तजार में है, सितारों कीे अंजुमन में।
बेबजह ही नही है माहौल में गर्मिये शरारत,
कोई दुश्मन छुपा हुआ है यारों की अंजुमन में।
सरासर सर ज़मीने सुर्ख है सरापा यार का,
इक शोला दहक रहा है, हजारों की अंजुमन में।
तारीफ हुस्ने यार कि बस इतना जान लीजे,
नज़र लुटती जा रही ' लिहाज़ ' नजारों की अंजुमन में।


शिगुफ्ता - खिला हुआ
ख़ार - काँटा
शरार - चिन्गारी
सरापा - सर से पाँव तक

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