हालात बदले तकदीर न बदली,
सरापा बदला तस्वीर न बदली।
गुलामी कल भी थी गुलामी आज भी है,
सय्याद बदला है, जंजीर न बदली।
ये लकीरें हाथ की हैं मिटाए नही मिटतीं,
हुकूमत बदली तहरीर न बदली।
आज भी लटकी है गर्दन पर गरीब के,
धार बदली है शम्शीर न बदली।
शम्शीर - तलवार
Thukra ke chalo jinko tum wo log to kismat wale hain. Karo jinki tamanna, unki kismat kya kahiye......
Tuesday, July 15, 2008
Monday, April 28, 2008
अंजुमन में ...
गुल यूं ही न शिगुफ्ता है, खारों की अंजुमन में।
कोई लुत्फ़ तो रहा है शरारों कीे अंजुमन में।
लोग तूफां को जीत आए हैं, मौजों से खेल आए हैं,
मैं कबसे जी रहा हूँ, किनारों की अंजुमन में।
इरादों सामाने सफर कर लो बहुत दूर जाना है,
तख्त इन्तजार में है, सितारों कीे अंजुमन में।
बेबजह ही नही है माहौल में गर्मिये शरारत,
कोई दुश्मन छुपा हुआ है यारों की अंजुमन में।
सरासर सर ज़मीने सुर्ख है सरापा यार का,
इक शोला दहक रहा है, हजारों की अंजुमन में।
तारीफ हुस्ने यार कि बस इतना जान लीजे,
नज़र लुटती जा रही ' लिहाज़ ' नजारों कीे अंजुमन में।
शिगुफ्ता - खिला हुआ
ख़ार - काँटा
शरार - चिन्गारी
सरापा - सर से पाँव तक
कोई लुत्फ़ तो रहा है शरारों कीे अंजुमन में।
लोग तूफां को जीत आए हैं, मौजों से खेल आए हैं,
मैं कबसे जी रहा हूँ, किनारों की अंजुमन में।
इरादों सामाने सफर कर लो बहुत दूर जाना है,
तख्त इन्तजार में है, सितारों कीे अंजुमन में।
बेबजह ही नही है माहौल में गर्मिये शरारत,
कोई दुश्मन छुपा हुआ है यारों की अंजुमन में।
सरासर सर ज़मीने सुर्ख है सरापा यार का,
इक शोला दहक रहा है, हजारों की अंजुमन में।
तारीफ हुस्ने यार कि बस इतना जान लीजे,
नज़र लुटती जा रही ' लिहाज़ ' नजारों कीे अंजुमन में।
शिगुफ्ता - खिला हुआ
ख़ार - काँटा
शरार - चिन्गारी
सरापा - सर से पाँव तक
जब भी आईना देखना...
जब भी आईना देखना, अपनी अदाओं में देखना।
मेरा भी अक्स हो शायद, निगाहों में देखना।
खोया हूँ इस कदर, ख़ुद को ढूँढता रह गया हूँ,
कोई गुमशुदा तो नही है, तेरी पनाहों में देखना।
आजिज़ आ गये हैं सब, मेरा दिल तलाश करके,
शायद कहाँ मिले, जरा ज़ुल्फ़ की घटाओं में देखना।
हांथों की बेखुदी में, कहीं धोखे से लिख दिया हो,
चुपके से मेरा नाम, किताबों में देखना।
हसरते दीदार में गर बुलाया तो फ़जीहत होगी,
मुझे आंखों में बंद करके, अपने ख्वाबों में देखना।
चमन-२ गुल में यूं क्या देखते हो ' लिहाज़ ',
रंगे लव उसका देखना है, तो फज़ाओं में देखना।
फ़जीहत - बदनामी
फज़ाओं - बहारें
मेरा भी अक्स हो शायद, निगाहों में देखना।
खोया हूँ इस कदर, ख़ुद को ढूँढता रह गया हूँ,
कोई गुमशुदा तो नही है, तेरी पनाहों में देखना।
आजिज़ आ गये हैं सब, मेरा दिल तलाश करके,
शायद कहाँ मिले, जरा ज़ुल्फ़ की घटाओं में देखना।
हांथों की बेखुदी में, कहीं धोखे से लिख दिया हो,
चुपके से मेरा नाम, किताबों में देखना।
हसरते दीदार में गर बुलाया तो फ़जीहत होगी,
मुझे आंखों में बंद करके, अपने ख्वाबों में देखना।
चमन-२ गुल में यूं क्या देखते हो ' लिहाज़ ',
रंगे लव उसका देखना है, तो फज़ाओं में देखना।
फ़जीहत - बदनामी
फज़ाओं - बहारें
Monday, April 21, 2008
तुम ही तुम....
गीत, ग़ज़ल, शायरी में तुम।
दिल, जिगर, आशिकी में तुम।
हिन्दी कि अदा में, उर्दू के नाज़ में,
कविता, नज़्म, सादगी में तुम।
जितना हसीं है दिल, उतनी ही हसीं रात,
अंधेरों में तुम, रौशनी में तुम।
ख्वाहिश में, दुआ में, ज़रूरत में,
दिल के करार में, तिश्नगी में तुम।
तन्हाईयां भी तुमसे, महफिलें भी तुमसे।
ग़म के साए में, हर खुशी में तुम,
लहू बहता है जैसे रगों में ' लिहाज़ ',
कुछ ऐसे बस गए हो जिंदगी में तुम।
तिश्नगी - प्यास
दिल, जिगर, आशिकी में तुम।
हिन्दी कि अदा में, उर्दू के नाज़ में,
कविता, नज़्म, सादगी में तुम।
जितना हसीं है दिल, उतनी ही हसीं रात,
अंधेरों में तुम, रौशनी में तुम।
ख्वाहिश में, दुआ में, ज़रूरत में,
दिल के करार में, तिश्नगी में तुम।
तन्हाईयां भी तुमसे, महफिलें भी तुमसे।
ग़म के साए में, हर खुशी में तुम,
लहू बहता है जैसे रगों में ' लिहाज़ ',
कुछ ऐसे बस गए हो जिंदगी में तुम।
तिश्नगी - प्यास
Friday, April 18, 2008
कहाँ से लाऊं
दिल तो बहुत करता है, मगर कहाँ से लाऊं।
शोल- ए - दीदार को, एक नज़र कहाँ से लाऊं।
ख्यालों में अब तेरी तस्वीर कि रानाई,
रूबरू आंखों के तेरा मंज़र कहाँ से लाऊं।
बागों-बाहर मिले, ना सावन कि फुहार में मिले,
खुश्नुमायी तेरी जुल्फ से बेहतर कहाँ से लाऊं।
तसब्बुर कि बात है, सब ख्यालों का जहान है,
तेरे प्यार कि दुनिया ज़मीं पर कहाँ से लाऊं।
कितने अंधेरे में आज भी रौशनी का आलम,
तुझको ए दिले नाशाद, नूरे - सहर कहाँ से लाऊं।
बहुत महंगी है ' लिहाज़ ' इस दौर में रोटियां,
अब दिल कि हसरतों का घर कहाँ से लाऊं।
शोले दीदार - देखने कि आग
नूरे- सहर - सुबह के उजाले
शोल- ए - दीदार को, एक नज़र कहाँ से लाऊं।
ख्यालों में अब तेरी तस्वीर कि रानाई,
रूबरू आंखों के तेरा मंज़र कहाँ से लाऊं।
बागों-बाहर मिले, ना सावन कि फुहार में मिले,
खुश्नुमायी तेरी जुल्फ से बेहतर कहाँ से लाऊं।
तसब्बुर कि बात है, सब ख्यालों का जहान है,
तेरे प्यार कि दुनिया ज़मीं पर कहाँ से लाऊं।
कितने अंधेरे में आज भी रौशनी का आलम,
तुझको ए दिले नाशाद, नूरे - सहर कहाँ से लाऊं।
बहुत महंगी है ' लिहाज़ ' इस दौर में रोटियां,
अब दिल कि हसरतों का घर कहाँ से लाऊं।
शोले दीदार - देखने कि आग
नूरे- सहर - सुबह के उजाले
Thursday, April 17, 2008
हवा कि जुम्बिश
तुम्हे छूकर आ रही है जो ए हवा आहिस्ता आहिस्ता।
एक एहसाह दे रहा है एक मज़ा आहिस्ता आहिस्ता।
तुम्हे महसूस कर रहीं हैं साँसों कि जुमबिश,
धड़कन में गए हो तुम समा आहिस्ता आहिस्ता।
यह लम्हा रंजो ग़म से दूर, बहुत दूर है,
मौसम भी हो रहा है शाद्माँ आहिस्ता आहिस्ता।
बुरूद - ए - हया पर तुम्हारी पलकें यूं झुकीं,
गोया झुकने लगा दफ्तन आसमां आहिस्ता आहिस्ता।
ये हँसते हुए गुलाब तेरे होंठों का करम है,
महकने लगा है गुलिस्ताँ आहिस्ता आहिस्ता।
ज़िंदगी राजी रहे ना रहे ' लिहाज़ ' इतना जरूर है,
बढने लगी है जीने कि तमन्ना आहिस्ता आहिस्ता।
जुम्बिश - आहट
शाद्माँ - खुश
बुरूद- ए - हवा = हया का आना
दफ्तन - अचानक
एक एहसाह दे रहा है एक मज़ा आहिस्ता आहिस्ता।
तुम्हे महसूस कर रहीं हैं साँसों कि जुमबिश,
धड़कन में गए हो तुम समा आहिस्ता आहिस्ता।
यह लम्हा रंजो ग़म से दूर, बहुत दूर है,
मौसम भी हो रहा है शाद्माँ आहिस्ता आहिस्ता।
बुरूद - ए - हया पर तुम्हारी पलकें यूं झुकीं,
गोया झुकने लगा दफ्तन आसमां आहिस्ता आहिस्ता।
ये हँसते हुए गुलाब तेरे होंठों का करम है,
महकने लगा है गुलिस्ताँ आहिस्ता आहिस्ता।
ज़िंदगी राजी रहे ना रहे ' लिहाज़ ' इतना जरूर है,
बढने लगी है जीने कि तमन्ना आहिस्ता आहिस्ता।
जुम्बिश - आहट
शाद्माँ - खुश
बुरूद- ए - हवा = हया का आना
दफ्तन - अचानक
Tuesday, April 15, 2008
नेअमत
कहीं दिन दिया है तो कहीं रात दी है।
कहीं प्यास की शिद्दत तो कहीं बरसात दी है।
अजीब फितरत है नेअमतें देने वाले की,
किसी को कुछ नही तो किसी को कायनात दी है।
कुछ तरसते हैं चंद खूबियों को उम्रभर,
एक तुम हो कि जिसे हर बात दी है।
शानों पे तेरी जुल्फें सावन कि कशिश हैं,
चेहरा परी सूरत आंखों में हयात दी है।
पूनम का चाँद भी है तेरे रुखसार से रौशन,
सुर्खिये लवों को शोखिये गुलाब दी है।
मौजों के तसब्बुर, एक रोज ख्याल आया,
तेरे चलने की अदा लहरों को भी मात दी है।
मौजों - समंदर
कहीं प्यास की शिद्दत तो कहीं बरसात दी है।
अजीब फितरत है नेअमतें देने वाले की,
किसी को कुछ नही तो किसी को कायनात दी है।
कुछ तरसते हैं चंद खूबियों को उम्रभर,
एक तुम हो कि जिसे हर बात दी है।
शानों पे तेरी जुल्फें सावन कि कशिश हैं,
चेहरा परी सूरत आंखों में हयात दी है।
पूनम का चाँद भी है तेरे रुखसार से रौशन,
सुर्खिये लवों को शोखिये गुलाब दी है।
मौजों के तसब्बुर, एक रोज ख्याल आया,
तेरे चलने की अदा लहरों को भी मात दी है।
मौजों - समंदर
Monday, April 14, 2008
क्यों कर जिया जाए
हँसकर जिया जाए कि रोकर जिया जाए।
ज़िंदगी तू ही बता तुझे क्योंकर जिया जाए।
हर साँस दिए जाती है एक दर्द का आलम,
किस तरह तेरे पहलु में दीद ए तर जिया जाए।
जिनके महफूज़ दिल हैं उनपे लानत है ज़िंदगी,
जीना तो वही है जीना किसी का होकर जिया जाए।
बेखुदी ज़ुनुने इश्क में पहुँची है इस मुकाम पर,
तुझे पाकर जिया जाए ना तुझे खोकर जिया जाए।
तू जब भी मिला है आंखें चुराकर मिला है,
अब किस बिना पर तेरा होकर जिया जाए।
जबकि मुर्दे भी कायल हैं तेरी बेज़ुबानी ते ' लिहाज़ ',
इससे कहीं बेहतर है की सीकर जिया जाए।
दीद ए तर - नम आंखें
ज़िंदगी तू ही बता तुझे क्योंकर जिया जाए।
हर साँस दिए जाती है एक दर्द का आलम,
किस तरह तेरे पहलु में दीद ए तर जिया जाए।
जिनके महफूज़ दिल हैं उनपे लानत है ज़िंदगी,
जीना तो वही है जीना किसी का होकर जिया जाए।
बेखुदी ज़ुनुने इश्क में पहुँची है इस मुकाम पर,
तुझे पाकर जिया जाए ना तुझे खोकर जिया जाए।
तू जब भी मिला है आंखें चुराकर मिला है,
अब किस बिना पर तेरा होकर जिया जाए।
जबकि मुर्दे भी कायल हैं तेरी बेज़ुबानी ते ' लिहाज़ ',
इससे कहीं बेहतर है की सीकर जिया जाए।
दीद ए तर - नम आंखें
नूरे मुजस्सम
नूरे मुजस्सम हिसाब से ज्यादा।
एक चेहरा हसीं है माहताब से ज्यादा।
आंखें कहूँ कि मयखाना कह दूँ,
निगाहों में नशा है शराब से ज्यादा।
सुबह की किरण रुख्सार की लाली,
सुर्खिए लव है गुलाब से ज्यादा।
फ़िर कैसे पढें तह्रीरे सूरत,
चेहरे पे लिखा है किताब से ज्यादा।
क्या करें नज़र हटती ही नही,
दिलकश है वो हिसाब से ज्यादा।
नूरे मुजस्सम - नूर का बना हुआ
एक चेहरा हसीं है माहताब से ज्यादा।
आंखें कहूँ कि मयखाना कह दूँ,
निगाहों में नशा है शराब से ज्यादा।
सुबह की किरण रुख्सार की लाली,
सुर्खिए लव है गुलाब से ज्यादा।
फ़िर कैसे पढें तह्रीरे सूरत,
चेहरे पे लिखा है किताब से ज्यादा।
क्या करें नज़र हटती ही नही,
दिलकश है वो हिसाब से ज्यादा।
नूरे मुजस्सम - नूर का बना हुआ
Sunday, April 13, 2008
जरा भी आसार होता
गर तेरे आने का जरा भी आसार होता।
आलमे तस्वीर में कुछ तो करार होता।
ना तो मीआद ही आई और ना तकाज़ा ही आया,
काश कोई वादा मेरे सर पर उधार होता।
निगाहे हसरत को लेकर मैं कभी घर से नही निकला,
गर निगाहे रहम मिलती तो रुस्वा हज़ार होता।
अछ्छा हुआ जो आज मैं वादिये नाला से दूर हूँ,
सुना है आज भी फ़िर किसी बिस्मिल पे वार होता।
माँ के सब्र का आलम है गला आज भी तर है,
वरना मैं भी कई रोज से नाहार होता।
मुफलिसी क्या है ' लिहाज़ ' मेरे उसूलों की बात है,
ज़मीर बेच देता तो मैं भी ज़मींदार होता।
आलम तस्वीर - निश्त्ब्ता का आलम
निगाहे हसरत - उम्मीद भरी निगाहें
वादिये नाला - फरियाद की घाटी
बिस्मिल - घायल
नाहार - भूखा प्यासा
आलमे तस्वीर में कुछ तो करार होता।
ना तो मीआद ही आई और ना तकाज़ा ही आया,
काश कोई वादा मेरे सर पर उधार होता।
निगाहे हसरत को लेकर मैं कभी घर से नही निकला,
गर निगाहे रहम मिलती तो रुस्वा हज़ार होता।
अछ्छा हुआ जो आज मैं वादिये नाला से दूर हूँ,
सुना है आज भी फ़िर किसी बिस्मिल पे वार होता।
माँ के सब्र का आलम है गला आज भी तर है,
वरना मैं भी कई रोज से नाहार होता।
मुफलिसी क्या है ' लिहाज़ ' मेरे उसूलों की बात है,
ज़मीर बेच देता तो मैं भी ज़मींदार होता।
आलम तस्वीर - निश्त्ब्ता का आलम
निगाहे हसरत - उम्मीद भरी निगाहें
वादिये नाला - फरियाद की घाटी
बिस्मिल - घायल
नाहार - भूखा प्यासा
Saturday, April 12, 2008
शाम आते आते
हाथों से फिसल जातीं हैं मंजिलें तमाम आते आते।
मैं रास्तों से भटक जाता हूँ हददे मकाम आते आते।
अजीब सा आलम है मेरे घर में चिरागों का,
उजालों से रूठ जाते हैं शाम आते आते।
हदे इंतजार क्या है? मेरे दिल से पूछिए,
फासला एक उम्र है गुजारा उसका पयाम आते आते।
हसरतों की बेजुबानी का कुछ तो ख्याल कर,
आजिज़ आ गया है दिल तेरे काम आते आते।
जाने क्या हो गया आजकल तेरी जुबां को,
बुराई पर उतर आतीं हैं मेरा नाम आते आते।
बदनसीबी हांथों की ' लिहाज़ ' कि पैमाने छुट जातें हैं,
लो आज भी रह गया लावों पर ज़ाम आते आते।
हददे मकाम - मकाम की हद, मंजिल की हद
आजिज़ आना - परेशान होना
मैं रास्तों से भटक जाता हूँ हददे मकाम आते आते।
अजीब सा आलम है मेरे घर में चिरागों का,
उजालों से रूठ जाते हैं शाम आते आते।
हदे इंतजार क्या है? मेरे दिल से पूछिए,
फासला एक उम्र है गुजारा उसका पयाम आते आते।
हसरतों की बेजुबानी का कुछ तो ख्याल कर,
आजिज़ आ गया है दिल तेरे काम आते आते।
जाने क्या हो गया आजकल तेरी जुबां को,
बुराई पर उतर आतीं हैं मेरा नाम आते आते।
बदनसीबी हांथों की ' लिहाज़ ' कि पैमाने छुट जातें हैं,
लो आज भी रह गया लावों पर ज़ाम आते आते।
हददे मकाम - मकाम की हद, मंजिल की हद
आजिज़ आना - परेशान होना
Wednesday, April 9, 2008
तेरी रानाई का आलम
यादों का तसब्बुर और तन्हाई का आलम,
तेरी जुल्फों पे जा ठहरा है ख्याल आरायी का आलम।
तुझे सोचा तो ख्यालों में रंगे बहार आई,तेरी जुल्फों पे जा ठहरा है ख्याल आरायी का आलम।
रह रहकर याद आया तेरी अंगडाई का आलम।
गुल में, गुलज़ार में छुपा है रंगीनिये बाहर में,
हुस्न आराई का आलम, तेरी रानाई का आलम।
शौके दीदार में कश्ती ऐ जां पे बनी है,
तेरी आंखें नक्श है एक गहराई का आलम।
मायूस चाहतों की अंजुमन में मोहब्बत को क्या मिला,
फ़कत एक दर्द का मौसम महज़ एक रुस्बायी का आलम।
हमसफ़र है तो ' लिहाज़ ' उजालों की रहगुजर तक,
बिल्कुल तेरे जैसा है मेरी परछाई का आलम.
ख्याल आरायी - ग़ज़ल का मौजू या सब्जेक्ट
हुस्न आरायी - हुस्न की सजावट
रानाई - सुन्दरता
Sunday, March 16, 2008
एह्सासे दिल
आज तुमसे दिल के कुछ भी न दरमियाँ है।
मसरूर तुम्हारे पहलु में आकर यह दिलो-जान है।
क्यों पूछते हो मेरे हमराज़ कैफ़ियत अपनी,
तुमसे ही ज़मीं है, तुमसे ही आसमां है।
खुश्नुमाई तुम्हारी ज़ुल्फ़ की क्या कहिये,
सुलझे तो ज़िगर है, उलझे तो दिलो-जां है।
किस मद्देनज़र तराशा है, इन को ए खुदा,
उनकी आंखें हैं, कोई ज़न्नत का शमां है।
सुकून देता है, तुम्हारे होठों पे तबस्सुम,
तुम हस्ते हो तो गोया ज़िंदगी शाद्मां है।
चुपके से कहती हैं उसके हांथों की नार्मियाँ,
आहिस्ता छुओ "लिहाज़", यह मोहब्बत का गीरेबां है।
मसरूर तुम्हारे पहलु में आकर यह दिलो-जान है।
क्यों पूछते हो मेरे हमराज़ कैफ़ियत अपनी,
तुमसे ही ज़मीं है, तुमसे ही आसमां है।
खुश्नुमाई तुम्हारी ज़ुल्फ़ की क्या कहिये,
सुलझे तो ज़िगर है, उलझे तो दिलो-जां है।
किस मद्देनज़र तराशा है, इन को ए खुदा,
उनकी आंखें हैं, कोई ज़न्नत का शमां है।
सुकून देता है, तुम्हारे होठों पे तबस्सुम,
तुम हस्ते हो तो गोया ज़िंदगी शाद्मां है।
चुपके से कहती हैं उसके हांथों की नार्मियाँ,
आहिस्ता छुओ "लिहाज़", यह मोहब्बत का गीरेबां है।
शाद्मां-खुश
कैफ़ियत-हालात
कैफ़ियत-हालात
Subscribe to:
Posts (Atom)