Saturday, April 12, 2008

शाम आते आते

हाथों से फिसल जातीं हैं मंजिलें तमाम आते आते।
मैं रास्तों से भटक जाता हूँ हददे मकाम आते आते।
अजीब सा आलम है मेरे घर में चिरागों का,
उजालों से रूठ जाते हैं शाम आते आते।
हदे इंतजार क्या है? मेरे दिल से पूछिए,
फासला एक उम्र है गुजारा उसका पयाम आते आते।
हसरतों की बेजुबानी का कुछ तो ख्याल कर,
आजिज़ आ गया है दिल तेरे काम आते आते।
जाने क्या हो गया आजकल तेरी जुबां को,
बुराई पर उतर आतीं हैं मेरा नाम आते आते।
बदनसीबी हांथों की ' लिहाज़ ' कि पैमाने छुट जातें हैं,
लो आज भी रह गया लावों पर ज़ाम आते आते।


हददे मकाम - मकाम की हद, मंजिल की हद
आजिज़ आना - परेशान होना

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