Monday, April 28, 2008

जब भी आईना देखना...

जब भी आईना देखना, अपनी अदाओं में देखना।
मेरा भी अक्स हो शायद, निगाहों में देखना।
खोया हूँ इस कदर, ख़ुद को ढूँढता रह गया हूँ,
कोई गुमशुदा तो नही है, तेरी पनाहों में देखना।
आजिज़ आ गये हैं सब, मेरा दिल तलाश करके,
शायद कहाँ मिले, जरा ज़ुल्फ़ की घटाओं में देखना।
हांथों की बेखुदी में, कहीं धोखे से लिख दिया हो,
चुपके से मेरा नाम, किताबों में देखना।
हसरते दीदार में गर बुलाया तो फ़जीहत होगी,
मुझे आंखों में बंद करके, अपने ख्वाबों में देखना।
चमन-२ गुल में यूं क्या देखते हो ' लिहाज़ ',
रंगे लव उसका देखना है, तो फज़ाओं में देखना।



फ़जीहत - बदनामी
फज़ाओं - बहारें

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