तुम्हे छूकर आ रही है जो ए हवा आहिस्ता आहिस्ता।
एक एहसाह दे रहा है एक मज़ा आहिस्ता आहिस्ता।
तुम्हे महसूस कर रहीं हैं साँसों कि जुमबिश,
धड़कन में गए हो तुम समा आहिस्ता आहिस्ता।
यह लम्हा रंजो ग़म से दूर, बहुत दूर है,
मौसम भी हो रहा है शाद्माँ आहिस्ता आहिस्ता।
बुरूद - ए - हया पर तुम्हारी पलकें यूं झुकीं,
गोया झुकने लगा दफ्तन आसमां आहिस्ता आहिस्ता।
ये हँसते हुए गुलाब तेरे होंठों का करम है,
महकने लगा है गुलिस्ताँ आहिस्ता आहिस्ता।
ज़िंदगी राजी रहे ना रहे ' लिहाज़ ' इतना जरूर है,
बढने लगी है जीने कि तमन्ना आहिस्ता आहिस्ता।
जुम्बिश - आहट
शाद्माँ - खुश
बुरूद- ए - हवा = हया का आना
दफ्तन - अचानक
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